Waste Tyre Crisis: How India Is Becoming the World’s Tyre Burning Hub

Waste Tyre Crisis-मध्य प्रदेश के मुरैना ज़िले के लोहारगढ़ पंचायत में जैसे ही पश्चिमी हवा चलती है, गांवों पर एक अदृश्य लेकिन घातक काली चादर तान दी जाती है।
तेज़ बदबू, आँखों में जलन, साँस लेने में तकलीफ़ और घरों की छतों, आँगनों, पेड़ों व फ़सलों पर जमती काली राख—यह यहाँ की रोज़मर्रा की हक़ीक़त है।

दिन भर की मेहनत के बाद खुले आँगन में सोने वाले लोग जब सुबह उठते हैं, तो उनके शरीर पर कालिख जमी होती है। यह सिर्फ़ धूल नहीं है—यह कैंसर फैलाने वाले रसायनों की परत है।

लोहारगढ़ अकेला नहीं है। इसके साथ 13 और गाँव इसी ज़हर में सांस ले रहे हैं।

जड़ में क्या है यह ज़हर?

मुरैना शहर से करीब 9 किलोमीटर दूर जडेरुआ इंडस्ट्रियल एरिया में स्थित टायर पायरोलिसिस (TPO) फैक्ट्रियाँ इस तबाही की जड़ हैं।

यहाँ स्क्रैप टायर जलाकर निकाला जाता है:

  • पायरोलिसिस ऑयल
  • कार्बन ब्लैक
  • स्टील वायर

कागज़ों में यह “रीसाइक्लिंग” है, लेकिन ज़मीनी सच्चाई में यह खुला ज़हरख़ाना है।

इन फैक्ट्रियों से निकलने वाली हवा में शामिल हैं:

  • पॉलीसाइक्लिक एरोमैटिक हाइड्रोकार्बन (PAHs)
  • डाइऑक्सिन
  • फ्यूरान
  • नाइट्रोजन ऑक्साइड
  • भारी धातुएँ: जिंक, सीसा, कैडमियम

ये सभी कैंसर, फेफड़ों की बीमारी, बच्चों में विकास बाधा और तंत्रिका तंत्र को नुकसान पहुँचाने वाले तत्व हैं।

लोग पिछले दस साल से कैंसर में सांस ले रहे हैं”

श्रीराम कॉलेज ऑफ फार्मेसी, मुरैना के प्रोफेसर योगेंद्र मावई पिछले एक दशक से इस इलाके में स्वास्थ्य प्रभावों पर शोध कर रहे हैं।

उनके शब्दों में,

“यहाँ के लोग रोज़ कैंसर में सांस ले रहे हैं। फैक्ट्रियाँ तय सीमा से कई गुना ज़्यादा टायर जला रही हैं।”

दिल्ली के पर्यावरण विशेषज्ञ सागर धरा कहते हैं,

“ये फैक्ट्रियाँ दो तरह के लोगों को मारती हैं—एक जो अंदर काम करते हैं और दूसरे जो इनके आसपास रहते हैं।”

Waste Tyre Crisis

मध्य प्रदेश नहीं, पूरा भारत धधक रहा है

  • मध्य प्रदेश में कुल 69 पायरोलिसिस प्लांट
  • सिर्फ़ मुरैना में 20 प्लांट
  • अकेले लोहारगढ़ में 13 प्लांट

पूरे भारत में:

  • 22 राज्यों में 736 पायरोलिसिस फैक्ट्रियाँ (सरकारी आंकड़ा)
  • विशेषज्ञों के अनुसार असली संख्या 1500 से ज़्यादा

उत्तर प्रदेश, हरियाणा और महाराष्ट्र इस ज़हर के सबसे बड़े केंद्र बन चुके हैं।

भारत: दुनिया का कूड़ेदान कैसे बना?

2022 में बैन, लेकिन सिर्फ़ कागज़ों पर

भारत ने 2022 में पायरोलिसिस के लिए वेस्ट टायर आयात पर प्रतिबंध लगाया।
लेकिन:

  • कोई निगरानी तंत्र नहीं
  • कोई ट्रैकिंग सिस्टम नहीं
  • कोई जवाबदेही नहीं

नतीजा?
आयात पाँच गुना बढ़ गया।

वर्षआयात (लाख मीट्रिक टन)
2020–212.64
2024–2513.72

HS Code: कानून में छेद

स्क्रैप टायर के लिए कोई अलग HS Code नहीं है।
उन्हें “रबर स्क्रैप” के नाम पर आयात किया जाता है।

मतलब:

  • कागज़ों में सब साफ
  • ज़मीन पर सब ज़हर

कस्टम अधिकारी चाहें तो पकड़ सकते हैं—अगर चाहें तो

विदेशों का कचरा, भारत की साँसों में

UK, USA, जर्मनी, इटली, ऑस्ट्रेलिया, UAE, सऊदी अरब जैसे देश
अपने वेस्ट टायर भारत भेज रहे हैं।

एक UK-आधारित NGO और BBC की जांच में सामने आया कि:

  • UK से भेजे गए टायर
  • कागज़ों में “कानूनी रीसाइक्लिंग”
  • हक़ीक़त में लोहारगढ़ जैसे TPO प्लांट्स में जलाए गए

लगभग 70% आयातित टायर अवैध रूप से जलाए जाते हैं।

पोर्ट से प्लांट तक: काला सफ़र

  1. टायर “बेल्स” में पोर्ट पर आते हैं
  2. 30% अच्छे टायर सेकंड-हैंड बाज़ार में बिकते हैं
  3. बाकी 70%:
    • रीमोल्डिंग
    • या सीधे पायरोलिसिस भट्टियों में

सब कुछ:

  • व्हाट्सएप
  • टेलीग्राम
  • नकद सौदे

रात के अंधेरे में ट्रक चलते हैं, काग़ज़ कुछ और कहते हैं, हक़ीक़त कुछ और।

EPR नीति: समाधान या ज़हर?

2022 में लाई गई Extended Producer Responsibility (EPR) नीति का मकसद था:

  • टायर कंपनियों को अपने कचरे की ज़िम्मेदारी देना

लेकिन हुआ उल्टा।

रीसाइक्लर:

  • सस्ते विदेशी टायर जलाते हैं
  • उन्हें घरेलू बताकर
  • EPR क्रेडिट बनाते हैं
  • और कंपनियों को बेचते हैं

जितना ज़्यादा जलाओ, उतना ज़्यादा कमाओ।

फैक्ट्री के अंदर: इंसान नहीं, ईंधन

मजदूर:

  • ₹500–800 दिहाड़ी
  • बिना मास्क, बिना दस्ताने
  • जहरीली भट्टी के सामने

“हमें बस सर्फ़ साबुन मिलता है,”
राजेश कुमार (42) कहते हैं।

“जब भट्टी खुलती है तो उल्टी हो जाती है।”

कुछ को गुड़ दिया जाता है—कहते हैं इससे कालिख पेट में चली जाएगी।

Waste Tyre Crisis

काग़ज़ों में सब ठीक, ज़मीनी सच गला घोंटता हुआ

प्रदूषण बोर्ड कहता है:

  • नोटिस दिए
  • फैक्ट्रियाँ बंद कीं
  • फिर “अनुपालन” के बाद खोल दीं

स्थानीय लोग कहते हैं:

“निरीक्षण से पहले फैक्ट्री वालों को खबर मिल जाती है।

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रोज़गार बनाम ज़िंदगी

कुछ युवाओं के लिए ये फैक्ट्रियाँ रोज़गार हैं।
दिहाड़ी है, पेट भरता है।

लेकिन कीमत?

  • काला पानी
  • ज़हरीली हवा
  • कैंसर
  • बर्बाद ज़मीन

यह एक मौन समझौता है—जीने के लिए मरने की कीमत।

निष्कर्ष: किस कीमत पर विकास?

भारत आज दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है।
लेकिन अगर विकास का मतलब:

  • गरीबों की साँसों में ज़हर
  • गाँवों को कूड़ेदान बनाना
  • विदेशी कचरे से मुनाफ़ा

तो यह विकास नहीं, धीमी हत्या है।